नासदासीन नो सदासीत तदानीं नासीद रजो नो वयोमापरो यत |
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद गहनं गभीरम ||
सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या, कहाँ किसने ढका था, उस पल तो अगम अतल जल भी कहां था |
सृष्टि का कौन है कर्ता? कर्ता है या है विकर्ता? ऊँचे आकाश में रहता,
सदा अध्यक्ष बना रहता, वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता है किसी को नही पता,
नही पता, नही है पता... नही है पता...
